गणेश चतुर्थी की कहानी
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। शास्त्रों और पुराणों में उनके जन्म की कई कथाएँ मिलती हैं। सबसे प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है –
बहुत समय पहले माता पार्वती जी स्नान के लिए जा रही थीं। उन्होंने स्नानगृह की रक्षा के लिए अपने शरीर के उबटन (हल्दी व चंदन के लेप) से एक सुंदर बालक की रचना की और उसमें प्राण फूंक दिए। वही बालक गणेश जी कहलाए।
माता ने उन्हें आदेश दिया कि जब तक वे स्नान करके न आ जाएँ, तब तक किसी को भी अंदर प्रवेश न करने देना।
इसी बीच भगवान शिव वहाँ आए और भीतर जाना चाहा। गणेश जी ने माता का आदेश मानते हुए उन्हें रोक दिया। शिव जी क्रोधित हो उठे और दोनों के बीच युद्ध हुआ। अंत में शिव जी ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती बाहर आईं और यह दृश्य देखा तो वे विलाप करने लगीं। उन्होंने क्रोध में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की ठान ली। तब देवताओं ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया।
शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाकर किसी जीव का सिर ले आएं। सबसे पहले उन्हें एक हाथी का सिर मिला। वही सिर गणेश जी के धड़ पर लगाया गया और उन्हें पुनः जीवन मिला। तभी से वे गजानन कहलाए।
भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि सबसे पहले उनकी पूजा होगी। तभी से किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, हवन या पूजा की शुरुआत में गणपति वंदन अनिवार्य हो गया।

गणेश चतुर्थी का महत्व
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यह उत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।
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इसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है।
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महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पूरे भारत में बड़े धूमधाम से इसकी पूजा होती है।
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इस दिन भक्त मिट्टी की गणेश प्रतिमा घर लाते हैं, पूजन-अर्चन करते हैं और 1.5, 3, 5, 7, या 11 दिनों बाद विसर्जन करते हैं।